महाभोज
द्वारा मन्नू भंडारी
महाभोज
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
महाभोज मन्नू भंडारी का एक शक्तिशाली और निर्भीक राजनीतिक उपन्यास है, जो मूल रूप से एक नाटक के रूप में लिखा गया था। यह भारतीय राजनीति के भ्रष्ट अंदरूनी कामकाज का विश्लेषण करता है।
मुख्य अंतर्दृष्टि
एक झुलसती हुई दोपहर, सड़कों पर धूल का गुबार और उस धूल के बीच पड़ा एक बेजान शरीर—सुखा। उसकी लाश के इर्द-गिर्द सिमटी खामोशी चीख रही है, लेकिन उस चीख को दबाने के लिए सियासत की एक पूरी मशीनरी तैयार है। यह मन्नू भंडारी का उपन्यास “Mahabhoj” है।
यह कोई साधारण कहानी नहीं है, यह सत्ता के गलियारों में रची गई उस क्रूर साजिश का कच्चा चिट्ठा है, जहाँ एक गरीब की मौत महज एक मोहरा बनकर रह जाती है।
एक दृश्य मुझे आज भी बेचैन कर देता है। कमरे में सीलन भरी घुटन है और दबे स्वर में ‘दा साहब’ अपने करीबियों से कह रहे हैं, “लाश का इस्तेमाल कैसे करना है, यह तो तुम जानते ही हो। अगर सुखा की मौत से हम अपनी कुर्सी मजबूत कर सकें, तो यह उसके लिए भी एक सम्मान ही होगा।” दूसरी तरफ, पीड़ित जोगनी की आँखों में है वो सवाल जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता। वह फुसफुसाती है, “क्या मेरे आदमी की जान की कीमत सिर्फ एक चुनावी मुद्दा है?” [short pause]
मन्नू भंडारी की लेखनी यहाँ एक शल्य चिकित्सक की तरह है, जो समाज के सड़े हुए जख्मों को बड़ी बेरहमी से चीरती है। वे लिखती हैं, “सत्ता जब न्याय का चोला ओढ़ती है, तो सबसे पहले सत्य का गला घोंटा जाता है।” [medium pause]
इस उपन्यास का असली सार यह है कि यह हमें दिखाती है कि कैसे लोकतंत्र में ‘महाभोज’ दरअसल आम आदमी की बलि चढ़ाकर रची गई एक दावत है। यहाँ न्याय नहीं, बल्कि ‘प्रबंधन’ होता है। लेखक ने शब्दों को जिस धार से इस्तेमाल किया है, वह रोंगटे खड़े कर देती है।
क्या यह सचमुच सिर्फ एक हत्या की कहानी है? या उस व्यवस्था की सच्चाई, जो हर दिन हमारे आसपास दम तोड़ रही है? [sigh] अगर आप सत्ता, इंसानियत और उस गहरी खाई को समझना चाहते हैं जो गरीब और रसूखदार के बीच खड़ी है, तो “Mahabhoj” पढ़ना अनिवार्य है। मन्नू भंडारी के इस मास्टरपीस को पढ़ने के बाद, आप अपनी आँखें कभी पहले जैसी नहीं रख पाएंगे।