स्थलपुराण
द्वारा भालचंद्र नेमाडे
स्थलपुराण
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
स्थलपुराण, भालचंद्र नेमाडे के कोसला चक्र का दूसरा उपन्यास, चंद्रकांत (चंदू) देशमुख के जीवन में गहराई से उतरता है क्योंकि वह ग्रामीण महाराष्ट्र की जटिलताओं को नेविगेट करता है। अपने अनुभव के बाद।
मुख्य अंतर्दृष्टि
क्या एक ऐसी जगह वापस लौटना संभव है, जिसे आपने कभी अपना नहीं माना था? क्या जड़ें मिट्टी में होती हैं या उन यादों में जिन्हें हम अपने साथ ढोते हैं? इन सवालों का जवाब भालचंद्र नेमाड़े की कालजयी कृति ‘Sthalpuran’ में मिलता है।
‘Sthalpuran’ केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की अपनी ही परछाईं से मुठभेड़ है। कहानी का नायक चंदू जब अपने पैतृक गाँव लौटता है, तो वहां की हवा में घुली पुरानी मिट्टी की महक उसे स्वागत नहीं, बल्कि एक अजनबी होने का एहसास कराती है।
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वहाँ का दृश्य देखिए: शाम ढल रही है। मटमैली धूल भरी गलियों में जलते हुए मिट्टी के दीयों की लौ कांप रही है। चंदू एक पुरानी चौपाल के पास खड़ा है, जहाँ हवा में सूखे घास और गायों के गोबर की तीखी गंध तैर रही है। वह उन लोगों को देख रहा है जो उसी ज़मीन से जुड़े हैं, जहाँ वह खुद को बेगाना महसूस करता है।
वहाँ का एक संवाद मुझे आज भी याद है, जब एक वृद्ध ग्रामीण चंदू से पूछता है, “शहर से तो आ गए, लेकिन क्या तुम खुद को साथ लाए हो?” चंदू चुप है, और उसके भीतर की खामोशी शोर मचा रही है। उसका डर यह नहीं है कि वह गाँव को नहीं जानता, बल्कि यह है कि वह शायद अब कहीं का नहीं रहा। [sigh]
भालचंद्र नेमाड़े की लेखनी की जादूगरी देखिए; वे भाषा को नहीं, बल्कि चेतना को बुनते हैं। वे लिखते हैं, “अस्तित्व की जड़ें उस मरुस्थल में अधिक गहरी होती हैं जहाँ पानी नहीं, केवल प्रतीक्षा शेष हो।”