मढ़ी दा दीवा
द्वारा गुरदयाल सिंह
मढ़ी दा दीवा
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
गुरदयाल सिंह की ‘मढ़ी दा दीवा’ पंजाब के निम्न-जाति के ग्रामीणों के जीवन की कठोर वास्तविकताओं को दर्शाने वाला एक मार्मिक उपन्यास है। यह कहानी दलित जागीर के इर्द-गिर्द घूमती है।
मुख्य अंतर्दृष्टि
एक मूक कसक, जो सीने में पत्थर की तरह जम जाती है—यही है ‘Marhi Da Diva’ का अनुभव। यह उस अकेले दीपक की कहानी है जिसे आंधियां बुझाना चाहती हैं, लेकिन वह जलता रहता है। पंजाब की धूल भरी पगडंडियों पर यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक वर्ग के अस्तित्व की चीख है।
गूर्दयाल सिंह ने उस समय को जीवंत किया है जब इंसान की कीमत उसकी मेहनत से नहीं, बल्कि उसकी जाति से तय होती थी। कहानी जगसीर की है, एक ऐसा इंसान जो अपनी सादगी और निस्वार्थ प्रेम के कारण समाज की बेड़ियों में जकड़ा गया है। [short pause]
एक दृश्य जो दिल को झकझोर देता है: कड़कड़ाती ठंड की रात है। हवा में गीली मिट्टी और ठंडी सरसों की महक है। जगसीर अपनी ‘मढ़ी’—यानी समाधि—के पास बैठा है। चिमनी की मंद रोशनी में उसकी परछाईं लंबी और डरावनी दिख रही है। पास ही भूसे की गंध है और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज सन्नाटे को चीर रही है।
तभी भानी वहां आती है। उनके बीच का संवाद, जो गूर्दयाल सिंह की लेखनी में अमर है:
“क्या तुम वाकई समझते हो कि दुनिया हमें कभी साथ रहने देगी?” भानी कांपती आवाज में पूछती है।
जगसीर पत्थर की तरह अडिग है, वह कहता है, “मिट्टी का दिया आंधी से नहीं, बुझने के डर से मरता है, भानी।”
[sigh]
जगसीर के भीतर का वह द्वंद्व, जहां वह अपनी स्वाभिमान को कुचले जाने के बावजूद चुप रहता है, यह दर्शाता है कि सत्ता और जाति का दमन कैसे इंसान की रूह को भी लहूलुहान कर देता है। गूर्दयाल सिंह का लेखन जादूई है, वे लिखते हैं: “समय की धुरी पर हर इंसान अपनी मढ़ी खुद खोदता है, पर जगसीर ने तो अपनी किस्मत के पन्ने ही रेत पर लिख दिए थे।”