जेडी स्मिथ्स व्हाइट टीथ: द इंटरपलेशन ऑफ द कोलोनियल सब्जेक्ट इन मल्टीकल्चरल ब्रिटेन
द्वारा सेरकान हमजा बागलामा
जेडी स्मिथ्स व्हाइट टीथ: द इंटरपलेशन ऑफ द कोलोनियल सब्जेक्ट इन मल्टीकल्चरल ब्रिटेन
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
जेडी स्मिथ के उपन्यास का एक अकादमिक विश्लेषण।
मुख्य अंतर्दृष्टि
अकेलापन सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक गहरी टीस है—वह एहसास जो तब होता है जब आप एक ऐसी दुनिया में सांस तो लेते हैं, मगर उस दुनिया का हिस्सा नहीं बन पाते। ज़ेडी स्मिथ के उपन्यास ‘व्हाइट टीथ’ के किरदारों की आँखों में झांकते हुए, सेर्कन हमज़ा बगलामा हमें इसी उस ‘दोहरे अलगाव’ (double alienation) से रूबरू कराते हैं। यह किताब हमें बताती है कि कैसे एक प्रवासी इंसान अपनी ही पहचान के चक्रव्यूह में फँसा रह जाता है, जहाँ न तो वह अपनी जड़ों से जुड़ा रह पाता है, न ही उस नई ज़मीन को अपना कह पाता है।
बगलामा का तर्क सरल है: औपनिवेशिक ब्रिटेन में रहने वाला एक प्रवासी दोहरी मार झेलता है। एक तरफ उसकी आर्थिक मज़बूरी है, तो दूसरी तरफ उसकी सांस्कृतिक पहचान का तिरस्कार। [short pause] वे इसे ‘दोहरा अलगाव’ कहते हैं। लेखक के शब्दों में, “ये किरदार उस ‘गैर-अस्तित्व के क्षेत्र’ (zone of nonbeing) में खड़े हैं, जहाँ उन्हें न तो पूरी तरह देखा जाता है और न ही पूरी तरह स्वीकार किया जाता है।”
सामद इक़बाल को देखिए, जो अपनी पुरानी औपनिवेशिक यादों में पनाह ढूँढता है, तो वहीं उनका बेटा मिलत कट्टरपंथ की ओर मुड़ जाता है। सेर्कन हमज़ा बगलामा बड़े बारीकी से बताते हैं कि कैसे ये ‘बचाव के तरीके’ (escape mechanisms) असल में आज़ादी नहीं, बल्कि और गहरी गुलामी हैं। जब आयरिस जोंस अपनी पहचान को सफेद सुंदरता के सांचे में ढालने की कोशिश करती है, तो वह अनजाने में उसी व्यवस्था को मज़बूत कर रही होती है जो उसे ठुकरा रही है।
आलोचक अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि क्या यह संघर्ष क्रांति है? बगलामा का जवाब साफ़ है—नहीं। यह महज़ एक ‘विद्रोही प्रतिक्रिया’ है। यह किताब उन सभी के लिए है जो महसूस करते हैं कि आधुनिक दुनिया में पहचान की लड़ाई कितनी जटिल है। जब आप इस सार को सुनेंगे, तो आप समझ पाएंगे कि कैसे हम अक्सर उन ही जंजीरों को सजाते हैं जो हमें जकड़े हुए हैं। क्या इस पहचान के शोर में, कभी कोई अपनी असल आवाज़ सुन पाता है? [sigh] इसका जवाब ढूंढने के लिए, ज़ेडी स्मिथ की ‘व्हाइट टीथ’ पर आधारित सेर्कन हमज़ा बगलामा की ‘Zadie Smith’s White Teeth: The Interpellation of the Colonial Subject in Multicultural Britain’ का यह सार ज़रूर पढ़ें।