पुत्तर ते पींघ
द्वारा अजमेर सिंह औलख
पुत्तर ते पींघ
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
अजमेर सिंह औलख का “पुत्तर ते पींघ” पंजाबी नाटकों का एक सम्मोहक संग्रह है जो सामाजिक अन्याय, वर्ग संघर्ष और रोजमर्रा के संघर्षों और आकांक्षाओं के शक्तिशाली चित्रण के लिए प्रसिद्ध है।
मुख्य अंतर्दृष्टि
अजमेर सिंह औलख की रगों में पंजाब की मिट्टी की वह तपन थी, जो अक्सर उपेक्षित और शोषित चेहरों की सिलवटों में छिप जाती है। एक ऐसे परिवेश में पले-बढ़े जहाँ खेत केवल फसल नहीं उगाते थे, बल्कि कर्ज़ और उम्मीदों का बोझ भी ढोते थे, औलख ने उन आवाज़ों को कलमबद्ध करने का संकल्प लिया जिन्हें इतिहास के पन्नों में हाशिए पर रखा गया था। ‘Putthar te Peengh’ के माध्यम से उन्होंने उस ग्रामीण पंजाब का आईना दिखाया है, जहाँ परंपरा की बेड़ियाँ और गरीबी का दंश इंसान को अंदर तक तोड़ देता है।
एक दृश्य देखिए। कड़कड़ाती धूप में जर्नेल अपने खेत की सूखी दरारों को निहार रहा है। हवा में धूल और पसीने की गंध घुली है। औलख यहाँ शब्दों से नहीं, बल्कि खामोशी से चित्रण करते हैं। वह लिखते हैं, “मजबूरी जब इंसान की हस्ती का हिस्सा बन जाए, तो वह पत्थर को भी मखमली बिस्तर समझने लगता है।”
यहाँ एक संवाद का ज़िक्र करना ज़रूरी है, जहाँ बाप और बेटे के बीच शिक्षा और ज़मीन के टुकड़ों को लेकर रस्साकशी होती है। पिता भारी आवाज़ में कहता है, “मिट्टी के साथ जियोगे तो यही मिट्टी तुम्हें ओढ़ लेगी।” बेटा पलटकर जवाब देता है, “मिट्टी के बिना पहचान कहाँ है, बाबूजी? हम अपनी जड़ें खुद काटकर भला कब तक टिक पाएंगे?” यह संवाद केवल एक झगड़ा नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों का अस्तित्व का संकट है।
औलख की लेखनी की सबसे बड़ी खूबी उनका यथार्थवाद है। वे उन सामाजिक कुरीतियों पर चोट करते हैं जो धर्म और जाति के नाम पर इंसान को दो हिस्सों में बाँट देती हैं। ‘Putthar te Peengh’ का सार यह है कि व्यवस्था का अन्याय चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, मनुष्य की भीतर की ‘पींघ’ यानी झूला हमेशा न्याय की ऊँची उड़ान भरने के लिए मचलती रहती है। यह किताब सिर्फ कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि दबे हुए लोगों के आत्म-सम्मान का दस्तावेज़ है। जब आप आखिरी पन्ना पलटेंगे, तो शायद आपके ज़हन में यह सवाल गूँजेगा—क्या हम भी उस पत्थर की तरह अपनी नियति से बंधे हैं, या हम भी उड़ना जानते हैं? [sigh] इसे पढ़ना, खुद को पहचानने की एक नई शुरुआत है।