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तुगलक

तुगलक

द्वारा गिरीश कर्नाड

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2m

भाषा

Kannada

रेटिंग

4.5

महत्व

Fiction

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तुगलक
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तुगलक
गिरीश कर्नाड
English Hinduism

तुगलक

गिरीश कर्नाड
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Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.

इस पुस्तक के बारे में

गिरीश कर्नाड का ‘तुगलक’ एक ऐतिहासिक नाटक है जो 14वीं सदी के दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल को दर्शाता है। यह नाटक तुगलक के चरित्र की जटिलताओं को उजागर करता है।

मुख्य अंतर्दृष्टि

गिरिश कर्नाड के मन में चौदहवीं सदी के एक सुल्तान की बेचैनी तब घर कर गई, जब उन्होंने सत्ता और अकेलेपन के बीच के उस बारीक धागे को महसूस किया जो इंसान को या तो फरिश्ता बना देता है या राक्षस। उन्होंने ‘Tughlaq’ को केवल इतिहास के पन्नों से नहीं, बल्कि अपनी उस गहरी छटपटाहट से गढ़ा, जो एक आदर्शवादी व्यक्ति तब महसूस करता है जब उसे पता चलता है कि उसका सबसे नेक इरादा ही उसके विनाश का कारण बन रहा है।

दिल्ली के दरबार में शाम ढल रही है। मशालों की पीली रोशनी पत्थर की ठंडी दीवारों पर नाच रही है और कमरे में पुराने परफ्यूम और सुखी हुई स्याही की तीखी गंध तैर रही है। सुल्तान मोहम्मद बिन ‘Tughlaq’ एक बड़ी मेज के सामने झुका हुआ है, उसकी आंखों में थकावट और पागलपन का अजीब मिश्रण है।

वहां एक दृश्य है जिसे भूल पाना नामुमकिन है। सुल्तान अपने ही वफादार सलाहकार से पूछता है, “क्या न्याय का अर्थ केवल कानून का पालन करना है, या उस मलबे को साफ करना जो समय की धूल ने जमा कर दिया है?” सलाहकार कांपती आवाज में जवाब देता है, “हुजूर, इतिहास न्याय नहीं, केवल परिणाम देखता है।” ‘Tughlaq’ एक फीकी मुस्कान के साथ खिड़की की ओर देखता है [short pause]। उसका मन एक ऐसे समंदर की तरह है जहां लहरें अपने ही किनारों को तोड़ने पर आमादा हैं। वह चाहता है कि लोग उसे समझें, लेकिन उसका भय उसे तानाशाह बना देता है।

‘Tughlaq’ का असली सार सत्ता के उस काले अंधेरे में छिपा है, जहां आदर्शवाद जब कुचला जाता है, तो वह क्रूरता में बदल जाता है। [medium pause] यह किताब हमें दिखाती है कि कैसे एक बुद्धिमान शासक का अहंकार पूरे साम्राज्य को राख कर सकता है। कर्नाड की लेखनी में वह चुभन है जो सीधे रूह को छूती है। वे लिखते हैं, “अंधेरा केवल बाहर नहीं, सुल्तान के मन के गलियारों में भी है।”

जब आखिरी पन्ना पलटता है, तो एक सवाल हवा में रह जाता है: क्या ‘Tughlaq’ महान था, या वह केवल एक टूटा हुआ सपना था जो हकीकत से टकराकर बिखर गया? आप खुद ही देखिए।

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