ओडाल बिद्दा (मिट्टी के बच्चे)
द्वारा देवनुरु महादेव
ओडाल बिद्दा (मिट्टी के बच्चे)
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
ओडाल बिद्दा, जिसका अर्थ है ‘मिट्टी के बच्चे’, देवनुरु महादेव का एक महत्वपूर्ण दलित उपन्यास है जो होलेया समुदाय के जीवन और संघर्षों को चित्रित करता है, जो भारत के भीतर एक हाशिए का समूह है।
मुख्य अंतर्दृष्टि
क्या आप जानते हैं कि ‘Odala Bidda’ के लेखक देवनूरु महादेव ने इस उपन्यास को लिखने के लिए केवल स्याही और कागज़ का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपनी ज़मीन और मिट्टी के प्रति प्रेम को ही अपनी भाषा बना लिया? यह किताब कर्नाटक के दलित संघर्षों का एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसे शायद ही कभी मुख्यधारा की कहानियों में जगह मिली हो।
[short pause]
गाँव की वह सुबह जहाँ केनचा और उसकी माँ बसम्मा रहती हैं, सड़ती हुई घास और गीली मिट्टी की गंध से भरी है। सूरज की पहली किरणें फूस की छत की दरारों से छनकर आती हैं, जो केनचा के चेहरे पर एक कठोर रेखा बनाती हैं। हवा में उस अपमान की भारीपन है जो बरसों से इन लोगों के सीने में दबी है। केनचा धीरे से अपनी माँ की ओर मुड़ता है।
मुझे वह दृश्य आज भी याद है जब केनचा अपनी माँ से कहता है, “माँ, क्या हम हमेशा दूसरों के ज़मीन के टुकड़ों पर अपने पसीने की फसल उगाते रहेंगे?”
बसम्मा की आँखें, जिनमें उम्र भर की थकान और राख है, अचानक चमक उठती हैं। वह कहती है, “बेटा, मिट्टी तो वही है, बस हम पर हक जमाने वालों के नाम बदल गए हैं।”
[sigh]