एनिप्पडिकल
द्वारा कक्कनादन
एनिप्पडिकल
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
एनिप्पडिकल, जिसे अक्सर ‘सीढ़ियाँ’ के रूप में अनुवादित किया जाता है, कक्कनादन का एक महत्वपूर्ण मलयालम उपन्यास है। यह श्रीधरन नामक एक सरकारी अधिकारी के नैतिक पतन का वर्णन करता है, जब वह भ्रष्ट नौकरशाही में काम करता है।
मुख्य अंतर्दृष्टि
सीढ़ियां ऊपर ले जाती हैं, लेकिन हर कदम के साथ नीचे गिरना ही नियति बन जाए, तो क्या होगा? ‘Enippadikal’ का विरोधाभास यही है। काक्कनाडन ने एक ऐसे इंसान की कहानी बुनी है जो ऊंचाइयों को छूने के लिए अपनी रूह की सीढ़ियां ही बेच देता है।
श्रीधरन, एक नौजवान जो ईमानदारी की मशाल लिए सरकारी तंत्र में कदम रखता है, लेकिन धीरे-धीरे वह उस दलदल में धंसता चला जाता है जिसे हम व्यवस्था कहते हैं। वह सरकारी दफ्तर की उस घुटन भरी हवा को महसूस करता है, जहां पुरानी फाइलों की धूल और बंद कमरों की खामोशी में नैतिकता का दम घुटता है।
एक दृश्य मुझे आज भी कचोटता है। श्रीधरन अपने मेज के सामने बैठा है। बाहर दोपहर की चिलचिलाती धूप खिड़की के कांच से छनकर उसकी फाइलों पर एक पीली, बीमार सी चमक डाल रही है। हवा में पुरानी स्याही और सड़ी हुई फाइलों की महक है। सामने उसका वरिष्ठ अधिकारी बैठा है, जो तिरस्कार भरी मुस्कान के साथ एक समझौता पेश करता है। [short pause]
वहां की बातचीत कुछ ऐसी है— “श्रीधरन, दुनिया नियम से नहीं, तालमेल से चलती है।”
श्रीधरन कांपते हुए हाथ से कलम उठाता है और फुसफुसाता है, “क्या यही वह ऊंचाई है जिसके लिए मैंने इतने सपने देखे थे?”
काक्कनाडन की भाषा में एक बर्फीली खामोशी है। उनका लेखन केवल भ्रष्टाचार की कहानी नहीं, बल्कि इंसान के भीतर के उस मरुस्थल का दस्तावेज़ है जहां सब कुछ सूख जाता है। वे लिखते हैं, “सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते इंसान अक्सर यह भूल जाता है कि वह अपनी ही कब्र की ऊँचाई बढ़ा रहा है।” [medium pause]
‘Enippadikal’ यह तर्क देती है कि भ्रष्टाचार सिर्फ पैसों का खेल नहीं है, बल्कि यह वह धीरे-धीरे होने वाला आत्म-विनाश है जिसे हम ‘समझौता’ कहते हैं। यह किताब पूछती है कि क्या अंत में मिली सफलता की कीमत इंसान का खुद से खो जाना है? [sigh]