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द लास्ट लेक्चर
Living while dying Mentorship and enabling others Overcoming 'brick walls' Resilience and optimism

द लास्ट लेक्चर

द्वारा रैंडी पॉश

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English

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Non-Fiction

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रैंडी पॉश
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द लास्ट लेक्चर

रैंडी पॉश
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Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.

इस पुस्तक के बारे में

Based on his world-renowned last lecture at Carnegie Mellon University, computer science professor Randy Pausch, who was diagnosed with terminal pancreatic cancer, delivers a powerful and inspiring guide on achieving childhood dreams, overcoming obstacles, and living a meaningful life.

मुख्य अंतर्दृष्टि

एक ऐसे मंच पर खड़े होना, जहाँ आपको पता है कि यह आपका आखिरी व्याख्यान है, और आपके फेफड़ों में कैंसर की वजह से सांसें कम पड़ रही हैं—यह दृश्‍य विस्मय और गहरे दुख का मिश्रण है। कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रैंडी पाऊश जब मंच पर पहुँचते हैं, तो वे अपनी मौत को एक बाधा की तरह नहीं, बल्कि एक अंतिम चुनौती की तरह स्वीकार करते हैं। रैंडी पाऊश की किताब “The Last Lecture” का मूल विचार बस इतना है: अपने सपनों को कैसे जिएं और अपनी विरासत कैसे छोड़ें, भले ही समय कितना ही कम क्यों न हो।

रैंडी पाऊश ने यह किताब अपने तीन छोटे बच्चों के लिए एक ‘संदेश’ के रूप में लिखी थी। वे कहते हैं, “दीवारें इसलिए होती हैं कि हम यह साबित कर सकें कि हम वास्तव में उस चीज को कितना चाहते हैं।” यह उनकी ‘ब्रिक वॉल’ फिलॉसफी है। वे मानते हैं कि जीवन में आने वाली बाधाएं हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि हमारे इरादों की परीक्षा लेने के लिए आती हैं।

रैंडी ने कई दावे किए हैं, जैसे कि ‘हेड फेक’ का सिद्धांत। वे समझाते हैं कि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सबक अक्सर हमें तब मिलते हैं जब हम कुछ और सीख रहे होते हैं। जैसे फुटबॉल खेलते हुए हम सिर्फ खेल नहीं, बल्कि टीमवर्क और अनुशासन सीखते हैं। उन्होंने अपने जीवन में शून्य गुरुत्वाकर्षण का अनुभव किया और डिज्नी में काम करने का सपना पूरा किया। जब उनसे पूछा गया कि क्या जीवन का यह आशावादी नजरिया केवल एक दिखावा है, तो रैंडी ने स्पष्ट किया कि निराशा में डूबे रहने से बेहतर है कि आप अपनी बची हुई ऊर्जा से दूसरों के सपनों को पूरा करने में मदद करें।

एक जगह रैंडी लिखते हैं, “समय को पैसे की तरह ही सोच-समझकर खर्च करना चाहिए।” [सांस] यह किताब केवल एक मरते हुए इंसान की दास्तां नहीं है, बल्कि यह जीने की कला का एक वैज्ञानिक ब्लूप्रिंट है। क्या रैंडी पाऊश के पास वाकई इतने साहस का स्रोत था? या उन्होंने इसे एक इंजीनियर की तरह गढ़ा था?

रैंडी पाऊश हमें सिखाते हैं कि हम अपने भाग्य को तो नहीं बदल सकते, लेकिन उसे खेलने का तरीका पूरी तरह हमारे हाथ में है। इस किताब के पन्ने आपको यह सोचने पर मजबूर करेंगे कि क्या आप आज अपनी जिंदगी का सबसे बेहतरीन दांव लगा रहे हैं?

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