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मैला आंचल

मैला आंचल

द्वारा फणीश्वर नाथ रेणु

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2m

भाषा

Bengali

रेटिंग

4.5

महत्व

Fiction

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मैला आंचल
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मैला आंचल
फणीश्वर नाथ रेणु
English Hinduism

मैला आंचल

फणीश्वर नाथ रेणु
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Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.

इस पुस्तक के बारे में

फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा लिखित, मैला आंचल एक महत्वपूर्ण हिंदी उपन्यास है जो स्वतंत्रता के बाद के भारत में मेरीगंज नामक एक दूरदराज के गांव में जीवन का ज्वलंत और यथार्थवादी चित्र प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास उस समय के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को दर्शाता है।

मुख्य अंतर्दृष्टि

क्या होगा अगर आप एक ऐसी दुनिया में कदम रखें, जहाँ आज़ादी की सुबह तो हो चुकी है, मगर आपके गाँव की मिट्टी अभी भी सदियों पुरानी बेड़ियों और अंधविश्वास की धूल से सनी हुई है?

फणीश्वरनाथ रेणु की कालजयी रचना “Maila Anchal” हमें बिहार के मेरीगंज ले जाती है। यहाँ की हवाओं में धान के खेतों की सोंधी महक और सड़ती हुई गरीबी का अजीब सा मेल है। डॉ. प्रशांत यहाँ एक मसीहा बनकर आते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वे विज्ञान की मशाल लेकर एक ऐसे अंधेरे में उतर रहे हैं, जहाँ जाति का ज़हर और सामंतवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे हवा को भी जहरीला कर देती हैं।

एक दृश्य मुझे आज भी कचोटता है। [short pause] दोपहर की तपती धूप है, गाँव के चौपाल पर धूल उड़ रही है और डॉ. प्रशांत एक बीमार बच्चे के पास झुके हुए हैं। हवा में नीम की कड़वाहट घुली है। डॉक्टर का हाथ कांप रहा है, क्योंकि एक तरफ विज्ञान है और दूसरी तरफ गाँव की बूढ़ी दाई, जो मंत्रों के जरिए इलाज का दावा करती है। डॉक्टर चिल्लाते हैं, “यह अंधविश्वास तुम्हें मार डालेगा!” दाई ठंडे स्वर में जवाब देती है, “बाबू, तुम शहर की दवा लाए हो, पर इस गाँव का मर्ज दवा से नहीं, रूह से जुड़ा है।”

यह किताब सिर्फ एक गाँव की कहानी नहीं है, यह उस भारत का आईना है जो अपनी ही परछाईं से लड़ रहा है। [medium pause] रेणु का शिल्प जादू जैसा है; उनकी भाषा में गाँव की धड़कनें सुनाई देती हैं। वे लिखते हैं, “मैला आंचल… जिसमें गाँव के आंसू और हंसी एक साथ घुल मिल गए हैं।”

रेणु का छिपा हुआ सत्य यह है कि सत्ता और सियासत कितनी भी बदल जाए, जब तक इंसान के भीतर का जातिगत अहंकार नहीं मरता, तब तक बदलाव का सूरज हमेशा धुंधला ही रहेगा। [sigh] क्या मेरीगंज के ये लोग कभी उन जंजीरों को तोड़ पाएंगे जो उनके पैरों में आज़ादी के बाद भी पड़ी हैं? या वे हमेशा इसी मैले आंचल में सिमटे रहेंगे? इस यात्रा को पूरा करने के लिए “Maila Anchal” को पढ़ना ही होगा।

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