कितने पाकिस्तान
द्वारा कमलेश्वर
कितने पाकिस्तान
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
कितने पाकिस्तान कमलेश्वर का एक शक्तिशाली और विचारोत्तेजक उपन्यास है, जो साहित्य अकादमी पुरस्कार के विजेता हैं। उपन्यास विभाजन, धार्मिक हिंसा और व्यापक इतिहास के विषयों की पड़ताल करता है।
मुख्य अंतर्दृष्टि
इतिहास की उस धुंधली अदालत में एक बूढ़ा न्यायाधीश बैठा है, जिसके सामने सदियों के हत्यारे और मसीहा एक साथ खड़े हैं। वह एक ऐसी आत्मा है जो समय के हर घाव को अपनी आँखों में समेटे हुए है। उसके सामने ‘किताब-ए-तारीख’ खुली है, जिसमें खून की स्याही से लिखे गए पन्ने अब भी गीले महसूस होते हैं। यह कहानी है उस अदीब की, जो इतिहास के उस मलबे में खड़ा होकर पूछ रहा है कि आखिर इंसानी फितरत में यह बंटवारा कहां से शुरू हुआ?
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कमलेश्वर ने ‘Kitne Pakistan’ के पन्नों में जो अदालत सजाई है, वहां बाबर और औरंगजेब से लेकर आधुनिक युग के आतंकवादी तक कठघरे में खड़े हैं। मुझे वह दृश्य याद है, जब इतिहास के वे साये एक-दूसरे से मुखातिब होते हैं। फिज़ा में पुरानी किताबों की धूल और ठंडी राख की महक घुली है। वहां एक संवाद है जो रूह को झकझोर देता है—जब एक पात्र पूछता है, “क्या मिट्टी के बंटवारे से रूहें भी कट जाती हैं?” और जवाब में सन्नाटा पसर जाता है। कमलेश्वर के शब्द वहां चोट करते हैं जहां हम अपनी पहचान को धर्म और सरहद के नाम पर छिपाते हैं।
वे लिखते हैं, “इतिहास खुद को दोहराता नहीं, हम उसे दोहराने पर मजबूर करते हैं।” [short pause]
यह किताब सिर्फ 1947 के बंटवारे की दास्तान नहीं है। यह उन तमाम सरहदों की चीख है जो हमने अपने ही भीतर खींच रखी हैं। कमलेश्वर की कलम का जादू यही है कि वे नफरत के काले कैनवस पर भी इंसानियत का एक बारीक रंग ढूंढ निकालते हैं।
क्या इतिहास के इस कटघरे में हम खुद को बेगुनाह साबित कर पाएंगे? या फिर हम भी उसी भीड़ का हिस्सा हैं जिसने हर दौर में सिर्फ तबाही चुनी है? इस सवाल का जवाब ‘Kitne Pakistan’ के आखिरी पन्नों के उस मद्धम उजाले में छिपा है, जहां उम्मीद की एक नन्ही सी लौ अब भी जल रही है। [long pause]