द मिलियनेयर नेक्स्ट डोर
द्वारा थॉमस जे. स्टेनली और विलियम डी. डैंको
द मिलियनेयर नेक्स्ट डोर
Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.
इस पुस्तक के बारे में
A data-backed examination of the habits of America’s wealthy, challenging the myth that wealth is synonymous with high-consumption lifestyles. The book demonstrates that true financial independence is typically the result of discipline, frugality, and long-term planning.
मुख्य अंतर्दृष्टि
कल्पना कीजिए एक ऐसे इंसान की जो आपसे एक साधारण सी पुरानी गाड़ी में मिलता है, जिसका पहनावा बेहद आम है और जो एक औसत पड़ोस में रहता है। आपको लगता है कि वह मुश्किल से अपना घर चला पा रहा होगा। लेकिन हकीकत यह है कि उसके पास करोड़ों की संपत्ति है। यह दृश्य है “The Millionaire Next Door” का, जिसे थॉमस जे. स्टेनली और विलियम डी. डान्को ने वर्षों की रिसर्च के बाद लिखा है।
इनका मुख्य संदेश सरल है: धन और दिखावा दो अलग चीजें हैं; असली अमीरी वह है जिसे आप बचाते हैं, न कि वह जिसे आप खर्च करते हैं। [short pause]
लेखक कहते हैं, “धनवान होने का अर्थ बहुत अधिक पैसा कमाना नहीं है, बल्कि उस पैसे को बचाकर रखना है।” इसका मतलब यह है कि 12 साल का बच्चा भी यह समझ सकता है कि आप कितना कमाते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप अपनी कमाई का कितना हिस्सा जोड़कर रखते हैं।
किताब में दो तरह के लोगों का जिक्र है: एक वे जो पैसे का पहाड़ खड़ा करते हैं, और दूसरे वे जो दिखावे के जाल में फँसकर अपनी पूरी कमाई लक्जरी कारों और महंगे घरों पर उड़ा देते हैं। लेखक बताते हैं कि सच्ची आर्थिक आजादी के लिए आपको अपने पड़ोसियों को खुश करने की नहीं, बल्कि अपने भविष्य को सुरक्षित करने की जरूरत है। [sigh]
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि सफलता के लिए अच्छा खानदान या बड़ी डिग्री जरूरी है। लेकिन लेखक अपने आंकड़ों से इसे गलत साबित करते हैं। उनके अनुसार, वेल्डिंग, पेस्ट कंट्रोल या मामूली से दिखने वाले व्यवसायों में लगे लोग अक्सर उन प्रोफेशनल्स से ज्यादा अमीर होते हैं जो अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के चक्कर में कंगाल हो जाते हैं।
सबसे दिलचस्प सलाह यह है कि बच्चों को बहुत अधिक आर्थिक मदद देना उन्हें कमजोर बनाता है। “आर्थिक बाह्य रोगी देखभाल” यानी बच्चों को हर जरूरत के लिए पैसे देना उनके भीतर संघर्ष करने की ताकत को खत्म कर देता है।