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राग दरबारी

राग दरबारी

द्वारा श्रीलाल शुक्ल

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2m

भाषा

Hindi

रेटिंग

4.5

महत्व

Fiction

AI द्वारा वाचन
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राग दरबारी
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राग दरबारी
श्रीलाल शुक्ल
English Hinduism

राग दरबारी

श्रीलाल शुक्ल
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Bhakti Yoga is a profound exploration of the path of devotion, presenting love, surrender, and spiritual discipline through the teachings of Swami Vivekananda.

इस पुस्तक के बारे में

राग दरबारी श्रीलाल शुक्ल का एक व्यंग्यात्मक हिंदी उपन्यास है, जो 1968 में प्रकाशित हुआ था। इसने 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता।

मुख्य अंतर्दृष्टि

‘Raag Darbari’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस काले आईने का नाम है, जिसमें आजादी के बाद के भारत का चेहरा देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति का सिर शर्म से झुक जाए। श्रीलाल शुक्ल ने जिस तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ व्यवस्था के सड़ चुके ढांचे को उकेरा है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना दशकों पहले था।

शिवपालगंज गांव की धूल भरी गलियों में दोपहर की चिलचिलाती धूप है। चारों ओर नीम के पेड़ों की कड़वाहट और सरकारी दफ्तरों में फैली उस घुटन भरी गंध का एहसास होता है, जहां फाइलों के बीच नैतिकता दम तोड़ देती है। वहां वैद्यजी का साम्राज्य है—एक ऐसा व्यक्ति जो पूरे गांव की राजनीति, शिक्षा और पंचायत को अपनी उंगलियों पर नचाता है। [short pause] वहां का दृश्य देखिए: वैद्यजी अपने तख्त पर बैठे हैं, उनके पास हुक्का गुड़गुड़ाते हुए चमचे बैठे हैं, और बाहर गांव के सीधे-सादे किसान अपनी जमीनें गंवा रहे हैं।

एक दृश्य मुझे आज भी याद है जब वैद्यजी अपने बेटे की शिक्षा और भविष्य को लेकर चर्चा करते हैं। वहां शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान पाना नहीं, बल्कि सत्ता का गलियारा खोजना है। वैद्यजी कहते हैं, “पढ़ा-लिखा आदमी वही है जो अपनी कुर्सी बचा ले।” यह संवाद व्यवस्था की जड़ों में घुसे उस दीमक को दिखाता है जो योग्यता को कुचलकर भाई-भतीजावाद को सींचता है।

श्रीलाल शुक्ल का लेखन कमाल का है। वे लिखते हैं, “इतिहास की गति बड़ी टेढ़ी होती है, वह अक्सर उन्हीं के पैरों तले कुचली जाती है जो उसे बदलने का दावा करते हैं।”

इस पुस्तक का असली तर्क यह है कि सत्ता के गलियारों में जो ‘राग’ बजता है, वह आम आदमी के दुख-दर्द का संगीत नहीं, बल्कि उन गद्दी पर बैठे लोगों की स्वार्थ भरी धुन है। [medium pause] जब रंगा गांव की सड़कों पर धूल फांकता हुआ निकलता है, तो उसे अहसास होता है कि यहां हर संस्था सिर्फ एक मुखौटा है। क्या शिवपालगंज सिर्फ एक गांव है, या यह हम सबके भीतर व्याप्त एक व्यवस्था का प्रतीक है? यह सवाल आपको अंत तक बेचैन रखेगा।

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